ललितपुर (विश्व परिवार)। पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य में ऋषभ विहार, दिल्ली में एस. ए. विश्वविद्यालय, नवादा के तत्वावधान में आयोजित ‘समयदेशना’ अनुशीलन राष्ट्रीय सेमिनार में नगर के डॉ सुनील जैन संचय को कुशल संयोजक की उपाधि से प्रशस्ति पत्र, प्रमाण पत्र, अंग वस्त्र, साहित्य, तिलक माला, स्मृति चिन्ह प्रदान कर अलंकृत किया गया। अध्यक्षता डॉ. श्रेयांस कुमार जैन, बड़ौत ने की। प्रो. फूलचंद्र प्रेमी, वाराणसी, प्रो. वीरसागर , दिल्ली, प्रो. नलिन के. शास्त्री, दिल्ली, डॉ. नरेंद्र कुमार जैन, टीकमगढ़, प्रो. श्रेयांस कुमार सिंघई, जयपुर, प्रो. जयकुमार उपाध्ये, दिल्ली, प्रो. ऋषभ चंद्र फौजदार, दमोह, प्रो. विजय कुमार , दिल्ली, डॉ. अनिल जैन प्राचार्य, जयपुर, डॉ. धर्मेंद्र जैन, जयपुर, प्रो. अनेकांत कुमार जैन, दिल्ली, डॉ. राकेश कुमार जैन, अंबाला, डॉ. पंकज जैन, इंदौर, डॉ सोनल कुमार जैन, दिल्ली, डॉ. अल्पना, ग्वालियर, डॉ. ज्योति खतौली, डॉ. आशीष शास्त्री, बम्होरी, डॉ. शिखरचंद्र, दिल्ली, पंडित दिनेश जैन, भिलाई, ब्र. राकेश भैया, भिंड, डॉ. बाहुबली जैन, इंदौर, डॉ. राजेश शास्त्री, ललितपुर आदि प्रमुखता से उपस्थित रहे।
इस मौके पर डॉ सुनील जैन संचय ने कर्मफल और स्वभाव चिंतन समयदेशना के परिप्रेक्ष्य में विषय पर अपना शोधालेख भी प्रस्तुत किया। जिसमें उन्होंने कहा कि ये सारा संसार कर्म प्रधान है, जो जैसा कर्म करता है उसे वैसा फल प्राप्त होता है। संसार के सभी दर्शन कर्म सिद्धान्त को किसी न किसी रूप में मानते हैं। जैनदर्शन कर्म सिद्धांत का बहुत सूक्ष्म विवेचन करता है। अपने द्वारा किए गए कर्म के उदय से ही जीवों को जन्म-मरण, सुख-दुख प्राप्त होते हैं।







