(विश्व परिवार)। “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” – यह केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि भारत की शाश्वत संस्कृति का उद्घोष रहा है। लेकिन पूजा और सम्मान से आगे बढ़कर, आज का भारत ‘अधिकार’, ‘अस्तित्व’ और ‘नेतृत्व’ की बात कर रहा है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल एक वैधानिक प्रलेख नहीं है, बल्कि सदियों से बंद उन द्वारों की कुंजी है जिसके पीछे भारत की आधी आबादी का सामर्थ्य अवरुद्ध था। यह अधिनियम किसी पर किया गया उपकार नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक अन्याय का परिमार्जन है जो कालचक्र ने महिलाओं के साथ किया। आज महिलाएं आरक्षण इसलिए नहीं मांग रही हैं कि वे निर्बल हैं; वे इसलिए मांग रही हैं क्योंकि राष्ट्र की नीति-निर्धारण की सर्वोच्च आसंदी पर उनका स्थान रिक्त है। भारत का लोकतंत्र केवल निर्वाचन की व्यवस्था मात्र नहीं, बल्कि एक जीवंत सामाजिक अनुबंध है, जिसकी पूर्णता महिलाओं की निर्णायक भागीदारी के बिना असंभव है।
आज जब हम इस ऐतिहासिक उपलब्धि का उत्सव मनाने तत्पर हो रहे हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि यह अधिनियम दशकों से अधर में लटका हुआ था। पूर्व की सरकारों में इच्छाशक्ति का अभाव था, जिसके कारण नारी शक्ति का यह अधिकार फाइलों में दबा रहा। यह अधिनियम केवल और केवल देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अदम्य इच्छाशक्ति और दूरदर्शी सोच का परिणाम है। प्रधानमंत्री जी ने ‘अमृत काल’ के इस दौर में यह सिद्ध कर दिया है कि उनके लिए नारी शक्ति केवल एक मतदाता समूह नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की सबसे बड़ी शक्ति है। मोदी जी ने अपनी माता और बहनों के प्रति जो संवेदनशीलता दिखाई है, वह अद्वितीय है। चाहे वह रसोई के धुएँ से मुक्ति दिलाने वाली ‘उज्ज्वला योजना’ हो, घर-घर शौचालय बनवाकर महिलाओं को सम्मान देने वाला ‘स्वच्छ भारत मिशन’ हो, या फिर हर घर जल पहुँचाकर माताओं के जीवन को सुगम बनाने का संकल्प—प्रधानमंत्री जी ने सदैव एक ‘हितेषी भाई’ और ‘पुत्र’ की भांति देश की महिलाओं की मूलभूत समस्याओं को समझा और उन्हें हल किया। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ उनके इसी अटूट समर्पण की अगली कड़ी है, जो महिलाओं को ‘लाभार्थी’ से उठाकर ‘नेतृत्वकर्ता’ की श्रेणी में खड़ा करती है।
जब हम सामर्थ्य की बात करते हैं, तो अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत की बेटियों ने वह कर दिखाया है जिसकी कल्पना भी कठिन थी। रितु करिधाल जी, जिन्हें ‘भारत की रॉकेट वुमन’ कहा जाता है, उनकी कहानी लखनऊ की तंग गलियों से शुरू होकर मंगल ग्रह की कक्षाओं तक पहुँचती है। मंगलयान मिशन (Mars Orbiter Mission) में ‘डिप्टी ऑपरेशन्स डायरेक्टर’ के रूप में उन्होंने वह जटिल गणित और गणनाएँ कीं, जिन्होंने भारत को पहले ही प्रयास में मंगल पर पहुँचने वाला विश्व का पहला देश बना दिया। एक माँ और एक वैज्ञानिक के दायित्वों के बीच संतुलन बिठाते हुए रितु जी ने सिद्ध किया कि महिला का प्रबंधन कौशल ब्रह्माण्ड की जटिलताओं को भी सुलझा सकता है।
वहीं, मुथैया वनिता जी का नाम भारत के चंद्रयान-2 मिशन के साथ स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे इसरो (ISRO) के इतिहास में किसी अंतरग्रहीय मिशन का नेतृत्व करने वाली पहली महिला प्रोजेक्ट डायरेक्टर बनीं। एक इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम इंजीनियर के रूप में उनका अनुभव और डेटा को समझने की उनकी अद्भुत क्षमता ने भारत के चंद्र अभियान को एक नई ऊँचाई दी। वनिता जी की सफलता यह संदेश देती है कि जब जटिल इंजीनियरिंग और तकनीक की बात आती है, तो भारत की बेटियाँ केवल सहभागी नहीं, बल्कि सर्वोपरि मार्गदर्शक हैं। इन दोनों वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया कि अब आसमान भी भारत की बेटियों की सीमा नहीं है।
”परंतु मातृशक्ति की यह उड़ान केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रही। जब हम वैश्विक क्षितिज पर देखते हैं, तो कल्पना चावला का नाम हमारे सामने आता है, जिन्होंने करनाल की मिट्टी से उठकर अंतरिक्ष के तारों तक पहुँचने का साहस दिखाया। वे आज भी हर उस बेटी के लिए प्रेरणा हैं जो अभावों के बीच बड़े सपने देखती हैं।
महिला नेतृत्व की प्रभावशीलता का एक और प्रकाश स्तंभ *सुषमा स्वराज जी* का कार्यकाल रहा। उन्होंने विदेश मंत्रालय को ‘रायसीना हिल्स’ की फाइलों से निकालकर आम नागरिक के द्वार तक पहुँचा दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि कूटनीति केवल मेज पर होने वाले समझौतों का नाम नहीं, बल्कि अपने नागरिकों के प्रति संवेदनशीलता का नाम है। उनका वह आश्वासन आज भी गूँजता है— “यदि आप मंगल ग्रह पर भी फँसे हैं, तो भारतीय दूतावास वहाँ आपकी मदद करेगा।” ‘ऑपरेशन राहत’ के माध्यम से हजारों भारतीयों को सुरक्षित बचाना और वैश्विक मंचों पर हिंदी की गर्जना करना, उनके सशक्त नेतृत्व का प्रमाण था।
शिक्षा और सेवा के क्षेत्र में भी बदलाव की लहर स्पष्ट है। ‘अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण’ (AISHE) के अनुसार, उच्च शिक्षा में महिलाओं के नामांकन में 32 प्रतिशत की वृद्धि* हुई है। स्वास्थ्य क्षेत्र में सत्तर प्रतिशत कार्यबल महिलाएं हैं। प्रशासनिक जगत में *किरण बेदी* जैसी अधिकारियों ने प्रधानमंत्री के काफिले का चालान काटकर यह संदेश दिया कि विधान की दृष्टि में सत्ता का कोई विशेष मोल नहीं है। यही वह निष्पक्षता और साहस है जिसकी आज हमारी राजनीति को आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री मोदी जी का मानना है कि ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य तभी प्राप्त हो सकता है जब विकास का नेतृत्व महिलाएँ करें। ‘मुद्रा योजना’ के माध्यम से आज करोड़ों महिलाएँ ‘लखपति दीदी’ बन रही हैं। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ से लेकर सेनाओं में महिलाओं के स्थायी कमीशन तक, मोदी जी ने हर बाधा को दूर किया है। यह अधिनियम उसी श्रृंखला का महा-अनुष्ठान है, जो राजनीति की सर्वोच्च संस्थाओं में महिलाओं की गर्जना सुनिश्चित करेगा। यह प्रधानमंत्री जी का अपनी देश की करोड़ों माताओं-बहनों को दिया गया एक ऐतिहासिक उपहार है।
विश्व भर की संसदों में महिलाओं का औसत प्रतिनिधित्व आज भी मात्र छब्बीस प्रतिशत है, जबकि भारत तैंतीस प्रतिशत के साथ दुनिया को राह दिखाएगा। यह अधिनियम उस मानसिकता पर प्रहार है जो महिलाओं को केवल ‘लाभार्थी’ मानती थी; अब वे ‘भाग्यविधाता’ की भूमिका में होंगी।
संसद और विधानसभाओं में यह आरक्षण केवल सीटों का बँटवारा नहीं, बल्कि हमारी राजनीति के चरित्र को बदलने का संकल्प है। 14 लाख महिला जन-प्रतिनिधियों ने पंचायतों में पहले ही अपनी कार्यक्षमता सिद्ध कर दी है। अब समय है कि वे राष्ट्र की नीतियों का निर्माण करें।
यह अधिनियम उन करोड़ों लड़कियों के आत्मविश्वास का विस्तार है, जो अब संसद की दीर्घा को देखकर यह कह सकेंगी- हाँ, मैं भी यहाँ पहुँच सकती हूँ।’
जब नारी सशक्त होगी, तभी राष्ट्र वास्तव में समर्थ होगा। प्रधानमंत्री जी के इस महान संकल्प के साथ, आइए हम सब मिलकर एक ऐसे भारत का निर्माण करें जहाँ शक्ति, सुरक्षा और समृद्धि की पहचान हमारी मातृशक्ति हो।





