नई दिल्ली (विश्व परिवार)। नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा से भारत-नॉर्वे संबंध और मजबूत हुए हैं। ‘ग्रीन स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप’ के तहत दोनों देश स्वच्छ ऊर्जा, सतत विकास, ब्लू इकॉनमी और ग्रीन शिपिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग को और विस्तार देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
प्रधानमंत्री जोनास ने मीडिया से चर्चा करते हुए कहा कि दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं की पूरकता, भारत की तेजी से बढ़ती और ज्ञान-आधारित होती अर्थव्यवस्था तथा युवा जनसंख्या सहयोग के लिए मजबूत आधार हैं। ‘ग्रीन स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप’ के तहत दोनों देश स्वच्छ ऊर्जा, सतत विकास, ब्लू इकॉनमी और ग्रीन शिपिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग को और विस्तार देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
नॉर्वे के प्रधानमंत्री ने कहा, “जब हमने यह समझौता किया, तो हमने खुद से पूछा कि हम इसे पूरा करने को लेकर कैसे आश्वस्त हो सकते हैं। इसे समझने का सबसे अच्छा तरीका रुझानों को देखना है। भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और ज्यादा से ज्यादा ज्ञान-आधारित होती जा रही है। भारत की आबादी युवा है और इसकी अर्थव्यवस्था बहुत गतिशील है। इन रुझानों और हमारी अर्थव्यवस्थाओं के बीच की पूरकता के आधार पर, हमारा मानना है कि हम उस लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं।”
आतंकवाद पर बात करते हुए पीएम जोनास गहर स्टोर ने कहा कि हम सभी को आतंकवाद के हर रूप के खिलाफ बहुत मजबूत रुख अपनाना होगा। उन्होंने कहा कि 15 वर्ष पहले हमने भी आतंकवाद के दर्द का सामना किया है। यहां सरकारी इमारतों को एक आतंकवादी हमले में उड़ा दिया गया था। जिन देशों ने ऐसे अनुभवों का सामना किया है, वे इससे होने वाले दर्द को समझते हैं।
हम आतंकवाद से प्रभावित देशों और लोगों के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त करते हैं।वहीं, रूसी कच्चे तेल को लेकर नॉर्वे के प्रधानमंत्री ने कहा कि हमारे ऐतिहासिक संबंध हैं और मैं इसका सम्मान करता हूं। भारत एक विशाल देश है और उसकी ऊर्जा आपूर्ति संबंधी जरूरतें हैं। साथ ही, नॉर्वे का मानना है कि यूक्रेन में चल रहे भयानक युद्ध को समाप्त करने के लिए रूस पर और अधिक दबाव डाला जाना चाहिए, ताकि वह बातचीत की मेज पर आए और युद्ध समाप्त करने की दिशा में गंभीरता से काम करे। क्योंकि यह युद्ध लोगों की जान ले रहा है, तबाही मचा रहा है और अस्थिरता पैदा कर रहा है।
प्रधानमंत्री जोनास ने आर्कटिक पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि आर्कटिक बहुत विशाल है। मैं आर्कटिक के उस हिस्से के बारे में बात कर सकता हूं जो नॉर्वे के अंतर्गत आता है। अभी समस्या यह है कि आर्कटिक काउंसिल में सहयोग प्रभावित हुआ है, क्योंकि रूस यूरोप में पूर्ण स्तर का युद्ध लड़ रहा है। इस वजह से आर्कटिक काउंसिल के कामकाज पर सीमाएं लग गई हैं। उन्होंने कहा कि हम चाहेंगे कि भारत अपनी लगातार बढ़ती प्रभावशाली और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक क्षमताओं के साथ आर्कटिक जलवायु अनुसंधान में हिस्सा ले, जो भारत की जलवायु के लिए भी महत्वपूर्ण है।







