दिल्ली (विश्व परिवार)। दिगम्बर जैन आचार्य ती विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्म-सभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि “भावना हमेशा श्रेष्ठ ही भाना चाहिए। भावना भव नाशनी होती है। शुभ-भावना से शुभास्रव होता है और अशुभ भावना से अशुभ- आसव होता है। जितना कर्म का बंध व्यक्ति भोग भोगकर नहीं करता है उससे भी अधिक बंध व्यक्ति भोग-भावना से कर लेता है।”
भोग ही रोग है और अतिभोग भयंकर बीमारियों की जड़ है। भोगों में लिप्त होकर मानव दुर्गति को प्राप्त होता है। भोगों में लिप्त लंपटी मरकर दुर्गति को प्राप्त होता है। भोग-भावना योग साधना की ओर नहीं बढ़ने देती है। सुख-शांति प्राप्त करना है, तो भोगों को छोड़कर योग धारण करो।
त्याग ही सुख का साधन है। त्याग से आनन्द आता है। त्याग मुक्ति का साधन है। त्याग मुक्ति का द्वार है। त्याग के मार्ग पर चलने वाला परम-शांति को प्राप्त करता है। त्याग करो, मुक्ति प्राप्त करो। मलिन चित्त धारक शांति प्राप्त नहीं कर सकता।
भोजन करना भी एक कला है। अति भोजन बीमारी एवं कुमरण का कारण बन जाता है। कषाओं को सीमित करो। पर्युषण-पर्व भावों की शुद्धि का पर्व है, इसमें सज्जन संयम-साधना पूर्वक उत्सव मनाते हैं। यह तप, त्याग का महोत्सव है। उपहास से बचना है, तो उपवास प्रारम्भ करो। उपवास परम-औषधि है। सीमित बोलो, अल्प भोजन करो ।
उत्साह शक्ति के साथ जीवन जियो। परिवार, समाज में उमंग, उत्साह होना चाहिए। उत्साह महाशक्ति है। उमंग के साथ कार्य करो। जो उत्साह के साथ कार्य करेगा, वह सुखद-फल प्राप्त करेगा। वाहन के पहिये में हवा भरदो तो वह हजारों किलो मीटर दौड़ना है, ऐसे-ही जिसके अन्दर उत्साह-शक्ति होगी वह असम्भव कार्य को भी सम्भव कर लेता है। नेता, सैनिक शिक्षक, विद्यार्थी एवं भोजन में उत्साह होगा, तो विश्व का विकास होगा। जन-जन में उत्साह का संचार करो।








