जयपुर (विश्व परिवार)। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज श्याम नगर जयपुर में संघ सहित विराजित है। आज उपदेश में बताया कि सुख और दुख कर्मों के अधीन है मनुष्य जन्म तीर्थंकरों का जैन कुल है जिसमें आपने धर्म प्राप्त किया। ऋषभदेव महामुनिराज ने धर्म तीर्थ का प्रवर्तन करने के लिए मंगल विहार किया 6 माह तक योग धारण कर उपवास किया उसके बाद भ्रमण करते रहे हस्तिनापुर में 6 माह के बाद अक्षय तृतीया पर राजा श्रेयांश ने पिछले जन्म के स्मृति जाति स्मरण होने पर नवधा भक्ति पूर्वक आहारदान दिया।आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने श्याम नगर प्रवचन में बताया कि प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने जब सन 1915 में क्षुल्लक दीक्षा धारण की तो श्रावकों को नवधा भक्ति का ज्ञान नहीं होने से कई दिनों तक उन्हें भी आहार नहीं मिला। आचार्य श्री शांतिसागर जी का दूध रस के अतिरिक्त अन्य पांच रसों का त्याग था। राजेश पंचोलिया ,सुरेश सबलावत, राजेश सेठी के अनुसार आचार्य श्री ने आगे प्रवचन में बताया कि तीर्थंकर भगवान धर्मतीर्थ का प्रवर्तन करते हैं उसी प्रकार राजा श्रेयांश ने प्रथम तीर्थंकर महा मुनिराज को दान देकर दान तीर्थ का प्रवर्तन किया। धर्म कार्य के पुण्य से भौतिक सुख समृद्धि सुख शांति प्राप्त होती है।धन की तीन गति होती है दान करो, उपभोग करो या नष्ट होता है। अक्षय तृतीया पर आहार दान का पुण्य भी अक्षय होता है जिनालय बनाना ,शास्त्र दान, शास्त्र छपवाना से भी ज्यादा महत्वपूर्ण आहार दान है क्योंकि इस आहार दान अभय दान , औषधि दान,शास्त्र दान सभी दान शामिल होते हैं। इसलिए दान का महत्व समझकर दान देकर मनुष्य जीवन को सार्थक करने का प्रयास करें।





