विदिशा (विश्व परिवार)। संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज एवं आचार्य श्री समयसागर महाराज के शिष्य मुनि श्री उद्यमसागर महाराज, मुनि श्री गरिष्ठ सागर महाराज एवं मुनि श्री हीरक सागर महाराज इन दिनों श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि ग्रीष्मकालीन वाचना का शुभारंभ हो चुका है।
प्रतिदिन प्रातः 5:15 बजे से ध्यान कक्षा एवं आचार्य भक्ति प्रातः 8:15 बजे आचार्य श्री की पूजन एवं दीप प्रज्ज्वलन एवं प्रवचन 9:30 बजे आहार चर्या (दौपहर 12 बजे से तीन बजे तक साधना काल) अपरान्ह 4:00 बजे से 5:00 बजे तक स्वाध्याय कक्षा (मुनि श्री गरिष्ठ सागर महाराज) सांयकाल 6:15 बजे से गुरु भक्ति ततपश्चात छोटे बच्चों की संस्कार कक्षा (मुनि श्री हीरक सागर महाराज) के द्वारा संपन्न कराई जा रही है।
प्रातःकालीन धर्मसभा में मुनि श्री उद्यमसागर महाराज ने णमोकार महामंत्र की महिमा पर प्रेरणादायक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक महिला अपने जीवन में अत्यंत संपन्न और सुखी थी। उसके पास किसी वस्तु का अभाव नहीं था, किंतु समय का चक्र बदला और उसका पुण्य उससे रूठ गया। धीरे-धीरे उसका वैभव, सुख और संपत्ति उससे दूर होते चले गए तथा वह मानसिक रूप से अत्यंत व्याकुल रहने लगी।
तभी किसी व्यक्ति ने उस महिला को एक बाबा के पास जाने की सलाह दी,जब व्यक्ती हैरान परेशान हो जाता है,तो जो जैसा कहता है वह उसकी सलाह मान लेता है,तो वह महिला भी बाबा के पास पहुँची, तब बाबा ने उसका परिचय पूछा। महिला ने विनम्रता से कहा — “मैं जैन हूँ।” यह सुनकर बाबा मुस्कुराए और बोले — “मैं जो भी मंत्र चिकित्सा करता हूँ, वह णमोकार महामंत्र के प्रभाव से ही करता हूँ।”
मुनि श्री ने कहा कि यह प्रसंग यह सिद्ध करता है कि णमोकार महामंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, कर्म निर्जरा और आध्यात्मिक जागरण का दिव्य माध्यम है। यह केवल जैन समाज की आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए मानसिक शांति, आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत है। श्रद्धा और विश्वासपूर्वक किया गया ‘णमोकार महामंत्र” का स्मरण मनुष्य के भीतर छिपी आध्यात्मिक शक्ति को जागृत कर देता है।उन्होंने कहा कि जब मनुष्य संसार के दुखों, चिंताओं और संकटों से घिर जाता है, तब यदि वह सच्चे भाव से णमोकार महामंत्र का आश्रय ले, तो उसके भीतर नई ऊर्जा, धैर्य और आत्मविश्वास का संचार होता है।मुनि श्री ने आगे कहा कि मनुष्य के अपने संचित पुण्य और पाप के प्रभाव से ही बाहरी निमित्त प्रभावित होते हैं, इसलिए किसी अन्य व्यक्ति को अपने दुखों का कारण मानकर दोषी नहीं ठहराना चाहिए। अपने कर्मों की जिम्मेदारी स्वीकार कर धर्म और साधना के मार्ग पर अग्रसर होना ही जीवन का वास्तविक कल्याण है।







