कुण्डलपुर (विश्व परिवार)। सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में विराजमान निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने प्रातःकालीन स्वाध्याय प्रवचन में जीव और शरीर के संबंध, आहार एवं त्याग की प्रक्रिया, पुद्गल के निरंतर परिवर्तन तथा जीवन के आध्यात्मिक नियमों पर गहन प्रकाश डालते हुए कहा कि जैन दर्शन की सूक्ष्मता को समझने के लिए भेदविज्ञान आवश्यक है। जीव के अंदर ग्रहण और त्याग के भाव उत्पन्न होते हैं, जबकि उनकी प्रक्रिया शरीर के माध्यम से संपन्न होती है। इच्छा, संज्ञा, आहार और संयम के परिणाम जीव में होते हैं, लेकिन उनकी अभिव्यक्ति शरीर के माध्यम से दिखाई देती है। परिणाम जीव का होता है और उसकी प्रक्रिया शरीर में घटित होती है। इस भेद को समझना ही वास्तविक ज्ञान है।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जय कुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने कहा कि जैन दर्शन का यह सिद्धांत अत्यंत सूक्ष्म है। इसे समझने के लिए ूभेदविज्ञान की दृष्टि विकसित करनी होगी। जीव जब ग्रहण का भाव करता है तो त्याग और संयम का भाव भी उसी के भीतर उत्पन्न होता है। शरीर केवल उसकी प्रक्रिया का माध्यम बनता है। इस सिद्धांत को जिसने गहराई से समझ लिया, वह आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग प्राप्त कर लेता है।
मुनि श्री ने पुद्गल के निरंतर परिवर्तन की चर्चा करते हुए कहा कि संसार में प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण परिवर्तित हो रही है। पेड़ में नई पत्तियां आना, फूल खिलना और फिर मुरझाकर गिर जाना, बालक का युवा और फिर वृद्ध होना परिवर्तन के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। लेकिन अनेक परिवर्तन ऐसे भी हैं जो हमारी आंखों से दिखाई नहीं देते। नया वस्त्र कुछ वर्षों तक बिना उपयोग के सुरक्षित रखने पर भी अपनी मूल गुणवत्ता खो देता है। इसका कारण काल के प्रभाव से पदार्थों का निरंतर परिवर्तन है। जीवन भी इसी परिवर्तनशील व्यवस्था का हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि दुनिया के प्रत्येक खेल के अपने नियम हैं। कबड्डी, क्रिकेट, फुटबॉल और अन्य खेलों के नियमों की जानकारी हमें रहती है। सड़क पर चलते समय और वाहन चलाते समय भी नियमों का पालन करना आवश्यक होता है, लेकिन आश्चर्य है कि मनुष्य जिस जीवन को जन्म से मृत्यु तक जी रहा है, उसके नियमों के प्रति ही गंभीर नहीं है। युवा, व्यापारी, किसान, विद्यार्थी और परिवार के प्रत्येक सदस्य को विचार करना चाहिए कि मानव जीवन का उद्देश्य क्या है और उसे किन नियमों के अनुरूप जीना चाहिए। बड़ी-बड़ी डिग्रियां और लौकिक ज्ञान प्राप्त करना पर्याप्त नहीं है, जीवन को सही दिशा देने वाला आध्यात्मिक ज्ञान भी आवश्यक है।
मुनि श्री ने आचार्य भगवन्त के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का संपूर्ण जीवन प्रेरणाओं का अक्षय भंडार है। उनके जन्मस्थान सदलगा की भौगोलिक, सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों से लेकर उनके बाल्यकाल, वैराग्य के बीजारोपण, साधु-संतों के सानिध्य, माता-पिता के साथ तीर्थवंदना और संयम मार्ग की ओर बढ़ने की यात्रा में अनेक प्रेरक प्रसंग जुड़े हैं। कठिनाइयों और बाधाओं को पार करते हुए उन्होंने जिस प्रकार संयम और साधना का मार्ग अपनाया, वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनुकरणीय है।
उन्होंने श्रोताओं को संत शिरोमणि प्रवचन माला के 60 एपिसोड देखने और सुनने की प्रेरणा देते हुए कहा कि इसमें आचार्य श्री के जीवन की क्रमिक यात्रा, उनके व्यक्तित्व, साधना, शिष्य परंपरा और दीक्षाओं से जुड़े अनेक प्रसंग समाहित हैं। इन प्रसंगों का अध्ययन प्रथमानुयोग के पुण्य पुरुषों के चरित्रों के अध्ययन के समान है। महापुरुषों के जीवन को पढ़ने और सुनने से नई पीढ़ी में संस्कार, श्रद्धा, वैराग्य और धर्म के प्रति अनुराग जागृत होता है। किस प्रसंग का किसके जीवन पर कितना गहरा प्रभाव पड़ेगा, यह कहा नहीं जा सकता।
मुनि श्री ने अंत में कहा कि कुण्डलपुर में प्रतिदिन आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए प्रातःकालीन स्वाध्याय धर्मलाभ का अवसर है। बड़े बाबा के दर्शन और चरणों में वंदना के लिए प्रतिदिन नए श्रद्धालु आते हैं। श्रोता बदलते रहते हैं, लेकिन बड़े बाबा और उनका संदेश शाश्वत हैं। तीर्थयात्रियों को यहां प्राप्त होने वाले स्वाध्याय का लाभ लेकर अपने जीवन में आत्मचिंतन, संयम और आध्यात्मिक जागृति के भाव विकसित करने चाहिए।







