धर्म

‘वाक्केशरी’ सम्मान से अलंकृत हुए ब्र. जयकुमार निशान्त, पं. विनोद रजवांस एवं डॉ. सुनील संचय

  • “सम्मान व्यक्ति का नहीं, उसके व्यक्तित्व और गुणों का होता है” — मुनि श्री प्रज्ञानसागर जी महाराज
  • आचार्य श्री विनिश्चयसागर जी महाराज का दशम आचार्य पदारोहण दिवस श्रद्धा पूर्वक मनाया गया

अजमेर (विश्व परिवार)। परम पूज्य आचार्य श्री विनिश्चयसागर जी महाराज के दशम आचार्य पदारोहण दिवस के पावन अवसर पर राजस्थान के सावर, अजमेर में रविवार, 24 मई 2026 को एक भव्य पुरस्कार अलंकरण समारोह श्रद्धा एवं गरिमा के साथ आयोजित किया गया। समारोह में प्रतिष्ठाचार्य ब्र. जयकुमार जी निशान्त (टीकमगढ़), प्रतिष्ठाचार्य पंडित विनोद कुमार जी रजवांस तथा युवा मनीषी डॉ. सुनील जैन जी संचय (ललितपुर) को उनके उत्कृष्ट साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक अवदान के लिए प्रतिष्ठित ‘वाक्केशरी सम्मान’ से सम्मानित किया गया।
यह गरिमामयी आयोजन मुनि श्री प्रज्ञानसागर जी महाराज एवं परम पूज्य मुनि श्री प्रसिद्धसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में संपन्न हुआ। सावर जैन समाज द्वारा सम्मानित विद्वानों को प्रशस्ति-पत्र, स्मृति-चिह्न, शाल, श्रीफल, अंगवस्त्र एवं सम्मान राशि भेंट कर अभिनंदित किया गया।
इस अवसर पर अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में मुनि श्री प्रज्ञानसागर जी महाराज ने कहा कि “सम्मान किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व, संस्कारों और गुणों का होता है। आज जिन विद्वानों का सम्मान हुआ है, वह उनके भीतर विद्यमान साहित्यिक, सांस्कृतिक और मानवीय मूल्यों का सम्मान है।”
उन्होंने आचार्य श्री विनिश्चयसागर जी महाराज के आचार्य पदारोहण दिवस पर भावपूर्ण शब्दों में कहा कि “मेरे गुरु ही मेरे सबकुछ हैं। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में एक गुरु का होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि गुरु ही जीवन को दिशा और दृष्टि प्रदान करते हैं।”
मुनि श्री प्रसिद्धसागर महाराज ने वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि “आज का व्यक्ति रील के लिए अधिक जी रहा है, रियल जीवन के लिए नहीं। यदि जीवन में वास्तविक सुख और कल्याण चाहिए तो हमें अपने जीवन को संस्कारवान, संयमित और वास्तविक बनाना होगा।”
आचार्य श्री विनिश्चयसागर जी महाराज के दशम आचार्य पदारोहण दिवस के उपलक्ष्य में संगीतमयी पूजन श्रद्धा और भक्ति के साथ सम्पन्न हुई। समारोह का शुभारंभ चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। मुनिश्री का पाद प्रक्षालन एवं जिनवाणी भेंट करने का सौभाग्य स्थानीय श्रावक-श्राविकाओं को प्राप्त हुआ। इस अवसर पर अनेक विद्वानों एवं श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के चरणों में विनयांजलि समर्पित कर अपने श्रद्धाभाव व्यक्त किए। समारोह में उपस्थित समाजजनों ने इसे आध्यात्मिक प्रेरणा, सांस्कृतिक चेतना एवं साहित्यिक गौरव का अद्वितीय संगम बताया।
आयोजन में स्थानीय समाज के साथ ही विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में आए श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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