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राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर श्रमदान का संकल्प:  आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज की प्रेरणा से 10 राज्यों में 2,700 से अधिक हाथकरघों के माध्यम से ग्रामीण स्वावलंबन का सशक्त अभियान

(विश्व परिवार)। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर श्रमदान ने भारतीय हाथकरघा परंपरा, ग्रामीण रोजगार और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के प्रति अपने संकल्प को पुनः व्यक्त किया।

यह अभियान पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन से प्रारंभ हुआ। उनका स्पष्ट संदेश था कि भारत का वास्तविक उत्थान गाँवों के आर्थिक, सांस्कृतिक और नैतिक पुनर्जागरण से ही संभव है। इसी विचार को आधार बनाकर श्रमदान ने पिछले एक दशक में हाथकरघे को केवल एक उद्योग नहीं, बल्कि ग्रामोदय से राष्ट्रोदय का माध्यम बनाया है।

आज श्रमदान का कार्य 10 राज्यों में संचालित हो रहा है, जहाँ 68 से अधिक हाथकरघा केंद्र तथा 9 से अधिक हस्तशिल्प केंद्र ग्रामीण भारत में कौशल, संस्कृति और स्वावलंबन का संगम बन चुके हैं।

पिछले 10 वर्षों में श्रमदान द्वारा—

  • 4,500 से अधिक ग्रामीण युवाओं एवं महिलाओं को प्रशिक्षण के बाद रोजगार मिला।
  • 2,700 से अधिक सक्रिय हाथकरघे संचालित किए जा रहे हैं।
  • लगभग साढ़े चार हजार परिवार इस अभियान से प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित हुए हैं।
  • 500 से अधिक घर-आधारित हाथकरघे स्थापित किए गए हैं।
  • 40 सूक्ष्म ग्राम केंद्र विकसित किए गए हैं।

श्रमदान की सबसे प्रेरणादायक पहल कारागारों में पुनर्वास का कार्य है। वर्तमान में देश की 9 जेलों में हाथकरघा इकाइयाँ संचालित हैं, जहाँ 305 से अधिक बंदी भाई-बहन सम्मानजनक कार्य से जुड़े हैं तथा 250 से अधिक बंदी प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद रिहा होकर समाज की मुख्यधारा में स्वाभिमान के साथ जीवन जी रहे हैं।

श्रमदान का मानना है कि हाथकरघा केवल वस्त्र निर्माण का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, कौशल विकास और मानवीय पुनर्वास का प्रभावी साधन है।

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर श्रमदान देशवासियों से आग्रह करता है कि वे भारतीय हाथकरघा उत्पादों को अपनाकर उन हजारों बुनकर परिवारों का समर्थन करें, जिनके श्रम से भारत की सांस्कृतिक विरासत आज भी जीवंत है।

श्रमदान का संदेश

“जब एक हाथकरघा चलता है, तब केवल कपड़ा नहीं बनता; एक परिवार आत्मनिर्भर होता है, एक गाँव सशक्त होता है और भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करता है।”

“आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज की प्रेरणा से प्रारम्भ हुई ग्रामोदय से राष्ट्रोदय की यह यात्रा वर्तमान में आचार्य श्री 108 समय सागर जी महाराज के मार्गदर्शन में सतत आगे बढ़ती जा रही है

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