गरियाबंद (विश्व परिवार)। छत्तीसगढ़ राज्य का स्थापना दिवस केवल एक सरकारी आयोजन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ियों की पहचान, अस्मिता, संघर्ष और गौरव का उत्सव है। हर साल 1 नवंबर को पूरा प्रदेश अपना स्थापना दिवस मनाता है। मध्यप्रदेश से अलग होकर 1 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ ने 26 वर्षों का सफर पूरा कर लिया है। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में अलग राज्य गठन का सपना साकार हुआ और तभी से राज्योत्सव छत्तीसगढ़ की गौरवशाली परंपरा का हिस्सा बना हुआ है। लेकिन गरियाबंद में इस बार राज्योत्सव के आयोजन स्थल को लेकर एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया है, जिसकी चर्चा अब आम लोगों के बीच होने लगी है।
दरअसल, अब तक जिला मुख्यालय गरियाबंद में होने वाले राज्योत्सव का आयोजन इस बार शहर से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर पुलिस परेड ग्राउंड में किया गया। जगह बदली, मंच सजा, रोशनी हुई, सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए, विभागीय प्रदर्शनियां लगीं और अतिथियों की मौजूदगी में आयोजन भी संपन्न हुआ। लेकिन इस पूरे आयोजन में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहा कि आखिर आम जनता कितनी संख्या में इस उत्सव का हिस्सा बन पाई?
पहले जिला मुख्यालय में आयोजित होने वाले राज्योत्सव की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि आम नागरिकों को इसके लिए कोई विशेष तैयारी नहीं करनी पड़ती थी। बाजार या किसी दूसरे काम से निकले लोग भी कुछ देर रुककर सांस्कृतिक कार्यक्रम देख लेते थे। शाम होते ही परिवार के साथ लोग पहुंच जाते थे। बुजुर्ग अपने छोटे बच्चों को लेकर आते थे। महिलाएं, युवा और आम नागरिक छत्तीसगढ़ी गीत-संगीत और लोक संस्कृति का आनंद लेते थे।
किसी को अलग से वाहन की व्यवस्था नहीं करनी पड़ती थी, न ही कार्यक्रम देखने के लिए इतनी दूर जाने की योजना बनानी पड़ती थी। शहर के बीच आयोजन होने से राज्योत्सव वास्तव में जनोत्सव जैसा नजर आता था।
लेकिन इस बार आयोजन स्थल शहर से दूर होने के कारण कई लोगों के सामने आने-जाने की असुविधा का सवाल खड़ा हुआ। कुछ लोग आपस में चर्चा करते नजर आए कि इतनी दूर कौन जाए, कैसे जाए और परिवार के साथ पहुंचना कितना सुविधाजनक होगा? हालांकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि दूरी ही कम उपस्थिति का एकमात्र कारण रही, लेकिन आयोजन स्थल की पहुंच पर सवाल जरूर उठ रहे हैं।
खाली कुर्सियां पूछ रही थीं जनभागीदारी का सवाल
राज्योत्सव में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और कार्यक्रमों की तैयारी अपनी जगह थी, लेकिन दर्शक दीर्घा में नजर आने वाली खाली कुर्सियां आयोजन की जनभागीदारी को लेकर चर्चा का विषय बन गईं। मंच पर कार्यक्रम चलता रहा, प्रस्तुतियां होती रहीं, अतिथियों के संबोधन भी हुए, लेकिन दर्शकों की मौजूदगी को लेकर जो तस्वीर सामने आई, उसने कई सवाल खड़े कर दिए।
सरकारी आयोजन की सफलता का आकलन केवल मंच की भव्यता, लाइटिंग, साउंड सिस्टम और अतिथियों की संख्या से नहीं होना चाहिए। असली सफलता तब है, जब आम नागरिक भी पूरे उत्साह के साथ उसमें शामिल हो। आखिर राज्योत्सव जनता के लिए है या केवल सरकारी कार्यक्रमों की औपचारिकता पूरी करने के लिए?
शासन-प्रशासन से सवाल, जनता की सुविधा किसकी जिम्मेदारी?
सवाल यह नहीं है कि पुलिस परेड ग्राउंड में आयोजन क्यों किया गया। सवाल यह है कि क्या आयोजन स्थल तय करते समय शहर के आम नागरिकों, बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों की सुविधा को प्राथमिकता दी गई थी? क्या शहर के भीतर या ऐसी जगह आयोजन संभव नहीं था, जहां अधिक से अधिक लोग आसानी से पहुंच सकें?
छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़ियों का राज्य है। इसकी संस्कृति, परंपरा और पहचान को संजोने वाला राज्योत्सव भी छत्तीसगढ़ के लोगों का ही उत्सव है। ऐसे में जनता को आयोजन से जोड़ना शासन-प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।
सरकारी स्तर पर आयोजन को सफल बताया जा सकता है, उपलब्धियों का बखान भी हो सकता है, लेकिन आम नागरिकों की भागीदारी का सवाल अपनी जगह कायम है। जनता की प्रतिक्रिया और आयोजन स्थल पर मौजूदगी भी किसी कार्यक्रम की वास्तविक पहुंच को समझने का महत्वपूर्ण पैमाना है।
छत्तीसगढ़िया हैं साहब, सुनते भी हैं और सहते भी हैं!
गरियाबंद के लोगों के मन में उठ रहे सवालों का जवाब कौन देगा? शहर से दूर आयोजन करने का फैसला किस आधार पर लिया गया? क्या अगले वर्ष राज्योत्सव को फिर से ऐसी जगह आयोजित करने पर विचार होगा, जहां आम नागरिक बिना किसी परेशानी के पहुंच सकें?
राज्योत्सव केवल तारीख निभाने का नाम नहीं है। यह उस राज्य का उत्सव है, जिसके लिए पीढ़ियों ने सपना देखा था। मंच पर छत्तीसगढ़ की संस्कृति का गुणगान हो और उसी संस्कृति के असली वाहक आम लोग आयोजन तक पहुंचने में असुविधा महसूस करें, तो इस व्यवस्था पर विचार होना ही चाहिए।
क्योंकि साहब, राज्योत्सव की असली रौनक मंच पर बैठे अतिथियों से नहीं, बल्कि सामने बैठकर तालियां बजाने वाली जनता से होती है। कुर्सियां भरने से ही आयोजन जनोत्सव बनता है। वरना रोशनी से जगमगाता मंच और खाली पड़ी दर्शक दीर्घा अपने आप में कई सवाल छोड़ जाती है।







