धर्म

“कषायों में कमी, वाणी में मृदुता और व्यवहार में सरलता ही वास्तविक भद्रता” :~निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज

  • “कुण्डलपुर में बड़े बाबा के चरणों में श्रद्धालुओं को दिया आत्मशुद्धि और गुरु भक्ति का संदेश, गुरु पूर्णिमा व्रत अपनाने की प्रेरणा”

कुण्डलपुर (विश्व परिवार)। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि सावन मास की समाप्ति और भाद्रपद मास के आरंभ के साथ प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में वास्तविक रूप से भद्र बनने का पुरुषार्थ करना चाहिए। भद्र होने का अर्थ केवल बाहरी सज्जनता नहीं, बल्कि अपने भीतर की कषायों को कम करना, वाणी में मृदुता लाना और व्यवहार को सरल एवं विनम्र बनाना है। यही वास्तविक भद्रता मनुष्य के व्यक्तित्व को श्रेष्ठ बनाती है।
कुण्डलपुर सिद्धक्षेत्र में बड़े बाबा के पावन चरणों में धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने कहा कि जो व्यक्ति अपने क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों को नियंत्रित करने का प्रयास करता है, उसके जीवन में सहजता और शांति का विकास होता है। मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य उसके आचरण और व्यवहार से प्रकट होता है।
मुनि श्री ने कहा कि कुण्डलपुर सिद्धक्षेत्र बड़े बाबा का पावन दरबार है। हजारों वर्षों से विराजमान बड़े बाबा की प्राचीन एवं अतिशयकारी मनोज्ञ प्रतिमा के समक्ष असंख्य श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजन, अर्घ्य, विधान और वंदना की है। इस पवित्र तीर्थ की आध्यात्मिक ऊर्जा श्रद्धालुओं के जीवन में आत्मविश्वास, शांति और सकारात्मकता का संचार करती है। उन्होंने आचार्य परंपरा का स्मरण करते हुए कहा कि गुरुवर आचार्य श्री ने मध्यप्रदेश में आगमन के पश्चात सन् 1976 में पहली बार कुण्डलपुर में बड़े बाबा के दर्शन किए और बड़े बाबा के हो गए, उनके पावन चरणों में चातुर्मास किया। बड़े बाबा की प्रभावना और कुण्डलपुर की पवित्र प्रेरणा से गुरुवर के धर्मप्रभावना कार्यों को निरंतर विस्तार मिला। इसके पश्चात जहां-जहां उनका विहार और प्रवास हुआ, वहां धर्म, संस्कृति और साधना की चेतना का व्यापक प्रसार हुआ।
मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि बड़े बाबा के चरणों में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने मन में अनेक आशाएं और भावनाएं लेकर आता है। जीवन में कई ऐसे दुख और कष्ट भी होते हैं, जिन्हें व्यक्ति दूसरों के सामने व्यक्त नहीं कर पाता। भगवान के चरणों में श्रद्धा और निर्मल भावों के साथ की गई प्रार्थना व्यक्ति को आंतरिक शक्ति प्रदान करती है और उसे विपरीत परिस्थितियों का सामना करने का संबल देती है। मुनि श्री ने गुरु पूर्णिमा के महत्व पर विशेष प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण जीवन को दिशा प्रदान करता है। गुरु के प्रति सच्ची भक्ति से व्यक्ति के जीवन में गुरुत्व, स्थिरता और शांति का विकास होता है।उन्होंने श्रद्धालुओं को गुरु पूर्णिमा व्रत अपनाने की प्रेरणा देते हुए कहा कि गुरु पूर्णिमा की स्मृति में व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार अट्ठाईस एकासन अथवा अट्ठाईस उपवास का संकल्प ले सकता है। इस संकल्प को एक वर्ष के भीतर पूर्ण करना श्रेष्ठ है, हालांकि अपनी परिस्थितियों और सामर्थ्य के अनुसार इसे अधिक समय में भी पूर्ण किया जा सकता है। महत्वपूर्ण बात संकल्प की दृढ़ता और उसके पीछे की पवित्र भावना है।मुनि श्री ने कहा कि जिस दिन एकासन या उपवास किया जाए, उस दिन गुरु पूजा अथवा अपने मार्गदर्शक गुरु के प्रति श्रद्धा-भक्ति की आराधना की जा सकती है। इसके साथ गुरु मंत्र का जप करने से मन में एकाग्रता और आध्यात्मिक शक्ति का विकास होता है।उन्होंने कहा कि गुरु भक्ति केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि जीवन को संस्कारित करने का माध्यम है। जिसने भी दिगंबर मुनि परंपरा को अपनाकर संयम और साधना का मार्ग स्वीकार किया है, उनके प्रति श्रद्धा का भाव रखना चाहिए। अपने-अपने गुरुओं का स्मरण करते हुए गुरु मंत्र का जप करना आत्मिक शांति का माध्यम बन सकता है।
ज्ञान का दीप स्वयं जलकर अनेक दीपों को प्रकाशित करता है, समापन अवसर पर मुनि श्री ने ज्ञान और साधना की महिमा को काव्यमय शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा कि जिस प्रकार सागर की गहराई में उतरने पर रत्न प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार आत्मचिंतन और साधना की गहराई में उतरने से जीवन के अनमोल गुण प्रकट होते हैं। ज्ञान का दीपक स्वयं प्रकाशित होने के साथ दूसरों के जीवन में भी प्रकाश फैलाता है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को केवल भगवान से अपनी समस्याओं के समाधान की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि भगवान के चरणों में पहुंचकर स्वयं को बदलने का संकल्प लेना चाहिए। कषायों को कम करना, व्यवहार को सरल बनाना, वाणी को मधुर बनाना और गुरु के प्रति श्रद्धा को दृढ़ करना ही वास्तविक धर्म साधना है। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि कुण्डलपुर में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज मुनि श्री पवित्र सागर महाराज ससंघ के चातुर्मास प्रवचनों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं। मुनि श्री द्वारा दिए जा रहे आत्मशुद्धि, संयम, गुरु भक्ति और सरल जीवन के संदेश श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणादायी सिद्ध हो रहे हैं।
मुनि श्री ने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि भाद्रपद मास के इस शुभ अवसर पर अपने भीतर की कषायों को कम करने का संकल्प लें और वाणी तथा व्यवहार में मृदुता एवं सरलता को अपनाएं। अपने भीतर की भद्रता को जागृत करना ही जीवन को श्रेष्ठ, शांत और सार्थक बनाने का वास्तविक मार्ग है। मुनि श्री ने जीवन जीने की कला,जीवन से जुड़ी सीरीज व्हाट इस लाइफ सीरीज पर प्रवचन आज से प्रारंभ किए हैं जिसका लाभ भी श्रद्धालु भक्तों को मिल रहा है।

Leave A Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Posts