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गोबरधन : जैव अपशिष्ट से समृद्धि की राह-विकास शर्मा

(विश्व परिवार)। किसी ने क्या खूब कहा है कि जिन्हें फेंक दिया था ज़माने ने बेकदरी से कभी, तराशा जो हुनर ने, तो वो शाहकार बन गए। यह पंक्ति भारत सरकार की जैव अपशिष्ट संवर्धन की राष्ट्रीय एकीकृत योजना गोबरधन के लिए बड़ी सटीक बैठती है। जैव अपशिष्टों का विशाल भंडार और उसका निपटान कभी एक समस्या थी पर अब वो नई संपदा और संभावना का केन्द्र रहा है। देश में प्रतिवर्ष उत्पन्न होने वाले 75 करोड़ टन जैव अपशिष्ट (बायोवेस्ट ) के बड़े हिस्से को उत्पादक संसाधन बनाने की दिशा में 23,731 करोड़ रूपए की बड़ी और महत्वाकांक्षी योजना है गोबरधन। इसमें जैव अपशिष्ट को संवर्धित कर स्वच्छ ईंधन, जैविक खाद के साथ ही आय और रोजगार में बदलने की व्यापक योजना है।

सीबीजी से स्वच्छ ईंधन

शहरी और ग्रामीण दोनों ही स्तर पर कंप्रेस्ड बायो गैस ( सीबीजी) जैव अपशिष्ट का सार्थक और उपयोगी विकल्प है। पहले से भी कुछ स्तर पर पशुधन अपशिष्ट से बायोगैस ईंधन प्राप्त किया जा रहा था और अब उसका ही परिष्कृत रूप है सीबीजी। असल में सीबीजी संयंत्र में बायो वेस्ट को बैक्टेरिया अपघटित करते हैं (तोड़ते हैं), जिससे मिथेन गैस प्राप्त होता है जो ईंधन के रूप में काम आता है। कच्चे बायोगैस में कार्बन डाईआक्साइड और हाइड्रो आक्साइड की अशुद्धियाँ भी होती हैं जिन्हें पृथक कर दिया जाता है। इसमें प्राप्त होने वाली लगभग 65 प्रतिशत मिथेन गैस को संवर्धित कर कंप्रेस किया जाता है। नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रतिवर्ष 6.2 करोड़ टन सीबीजी उत्पादन की क्षमता है। इस स्वच्छ ईंधन का लाभ घरेलू , व्यवसायिक तथा औद्योगिक क्षेत्र में लिया जा सकता है। सरकार ने गोबरधन को बढ़ावा देने के लिए प्राकृतिक गैस में सीबीजी के सीमित मिश्रण (ब्लेंडिंग) को भी मंजूरी दी है।

वेस्ट टू वेल्थ का मंत्र

जैव अपशिष्ट के प्रमुख स्रोतों में कृषि अवशेष , पशुधन अपशिष्ट, शहरी और औद्योगिक जैव अपशिष्ट शामिल हैं। जैव अपशिष्ट से जहाँ सीबीजी के रूप में स्वच्छ ईंधन प्राप्त होता है वहीं इसके सह उत्पाद के रूप में जैविक खाद का बड़ा हिस्सा होता है। सीबीजी संयंत्रों के माध्यम से अनुमान के मुताबिक 35 करोड़ टन जैविक खाद तैयार किया जा सकेगा। अपशिष्ट प्रबंधन के इस पूरे तंत्र में सीधा लाभ ग्रामीण और शहरी दोनों की क्षेत्रों के लोगों को होगा। यह अपशिष्ट संग्रहण, परिवहन, भंडारण, संयंत्र संचालन सहित प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार के नए अवसर सृजित करने में सफल होगा। यानी कचरे को संपदा के रूप में विकसित कर कमाऊ संसाधन बनाने का बेहतर विकल्प भी मिलेगा।

गौ, ग्राम और ग्रामीण अर्थव्यवस्था

भारत में जैव अपशिष्ट का बड़ा हिस्सा कृषि और पशुधन अपशिष्ट से प्राप्त होता है। खेतों की पराली, सब्जी के अवशेष , गोबर , शक्कर कारखानों का अपशिष्ट आदि इसमें प्रमुख रूप से शामिल हैं। सीबीजी के लिए कुल कच्चा माल (फीड स्टॉक) का 70 प्रतिशत कृषि अवशेष तथा पशु अपशिष्ट से प्राप्त होगा जो लगभग 37 करोड़ टन प्रतिवर्ष अनुमानित है। स्वाभाविक रूप से बायो गैस के बड़े संयंत्रों की स्थापना से प्रत्यक्ष और परोक्ष लाभ ग्रामीणों विशेषकर किसानों एवं पशुपालकों को होगा।

छत्तीसगढ़ और जैव अपशिष्ट की सर्कुलर इकोनामी

ग्रामीण विकास और ग्राम स्वावलंबन की इस महती योजना पर छत्तीसगढ़ पहले से ही काम कर रहा है। राज्य शासन की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में धान का पैरा सहित अन्य कृषि अवशेष और पशुधन अपशिष्ट से 9.47 लाख टन प्रति वर्ष तथा शहरी स्थानीय निकायों से 3.95 लाख टन प्रतिवर्ष जैव अपशिष्ट निकलता है जो बताता है कि सीबीजी यहाँ कितना कारगर हो सकता है। सरकार का आंकलन है कि प्रारंभिक तौर पर 1.65 लाख मीट्रिक टन सीबीजी उत्पादन किया जा सकता है साथ ही अंजोर विजन 2047 के मुताबिक आगामी वर्षों में यह 5 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच सकता है। देश में क्रियाशील 189 सीबीजी परियोजनाओं में से 04 तथा कार्यशील सामुदायिक (क्लस्टर आधारित) सीबीजी परियोजनाओं के 979 में से 283 परियोजनाएं छ्त्तीसगढ़ में क्रियाशील हैं। यह दर्शाता है कि प्रदेश ने प्रारंभिक बढ़त इस दिशा में हासिल कर ली है। छत्तीसगढ़ में सहकारिता के माध्यम से सीबीजी संयंत्र कहीं अधिक उपयोगी और कारगर सिद्ध हो सकते हैं। यह भी सुखद है कि गोबरधन योजना की शुरूआत में राज्य को प्राथमिकता भी प्रदान की गई है।

ऊर्जा चुनौतियों का देशी विकल्प

वैश्विक चुनौतियों के बीच जैव अपशिष्ट से प्राप्त जैव ईंधन को विकल्प के तौर पर उपयोग किए जाने की दिशा में गोबरधन योजना दूरगामी परिणाम देने वाली योजना बन सकती है। यह महज जैव अपशिष्ट का निपटान नहीं , न ही यह मात्र ईंधन तैयार करने का विकल्प। गोबरधन योजना कृषि, कृषक, गौ और ग्राम को केन्द्र में रखकर तैयार चक्रीय अर्थव्यवस्था ( सर्कुलर इकोनामी) को विकसित करने की योजना है। इसके परिणाम स्थाई लाभ देने वाले होंगे। धान और कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ को इस संभावित अवसर का अधिकतम लाभ दिलाने में नई पीढ़ी, विशेषकर उत्साही, नवाचार और उद्यमिता पसंद जेन- जी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

 

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