(विश्व परिवार)। एक ही छत के नीचे तीन पीढ़ियाँ रह रही हैं, पर तीनों की दुनियाएँ अलग-अलग हैं। दादाजी को सुबह का भजन और अखबार चाहिए, पिताजी को चाय के साथ टीवी न्यूज और बेटे को हाथ में मोबाइल और कानों में ईयरफोन। हम एक साथ रहते तो हैं, पर एक साथ जीना भूल गए हैं। यही है पीढ़ी अंतराल, जो आज परिवार से लेकर समाज तक की सबसे बड़ी अदृश्य दरार बन गया है।
पहले यह अंतराल इतना नहीं अखरता था, क्योंकि परिवार संयुक्त थे और संवाद सहज था। आज परिवार सिकुड़े हैं, समय सिमटा है और तकनीक ने गति बढ़ा दी है। परिणाम यह है कि अनुभव और ऊर्जा के बीच एक खाई बन गई है। लगभग 80 वर्ष पूर्व संयुक्त परिवार होते थे एक परिवार में लगभग 30 से 35 सदस्य होते थे। 60 वर्ष पूर्व परिवार छोटे हुए एक परिवार में ज्यादातर 10 सदस्य रहने लगे। 40 वर्ष पूर्व परिवार में चार या पांच सदस्य रह गए 20 वर्ष पूर्व परिवार सिकुड़ कर तीन या चार सदस्य का रह गया वर्तमान में परिवार में मात्र दो सदस्य पति एवं पत्नी। पति-पत्नी दोनों नौकरी कर रहे हैं संतान नहीं चाहिए। 80 वर्ष पूर्व बारात बैलगाड़ी से जाती थी, 60 वर्ष पूर्व बारात बस से जाने लगी, 40 वर्ष पूर्व बारात जीप कारों से जाने लगी 20 वर्ष पूर्व बारात जाना बंद हो गई लड़की वाले को ही लड़के वाले अपने नगर में बुलाते हैं और विवाह करते है। वर्तमान में तो नई पीढ़ी विवाह न कर वीक एंड मैरिज करके मात्र शनिवार इतवार को पति-पत्नी के रूप में एक साथ रहते है। 80 वर्ष पूर्व लड़की के लिए योग्य लड़का देखने गांव का नाई जाता था ,60 वर्ष पूर्व लड़का देखने परिजन जाते थे, 40 वर्ष पूर्व लड़का देखने माता-पिता जाते थे। और अब लड़की स्वयं अपने पति का चयन करती है। 80 वर्ष पूर्व मोटा खाते थे, मोटा पहनते थे, 60 वर्ष पूर्व दाल रोटी खाने लगे, 40 वर्ष पूर्व इडली डोसा का चलन आया। अब नई पीढ़ी पिज़्ज़ा बर्गर खा रही है। इस खानपान से कैंसर जैसी बीमारियां बढ़ रही है।अंतराल बढ़ने के तीन बड़े कारण
पहला कारण है तकनीकी क्रांति। आज का युवा डिजिटल युग का मूल निवासी है, जबकि पुरानी पीढ़ी इस दुनिया में बाद में आई है। एक को हर सूचना गूगल पर चाहिए, दूसरे को किताब और अनुभव पर भरोसा है। एक को रिश्ते ऑनलाइन चाहिए, दूसरे को आंगन में।
दूसरा कारण है मूल्यों और आकांक्षाओं में बदलाव। पुरानी पीढ़ी ने त्याग, संतोष और सामूहिकता को जीवन-मूल्य माना। नई पीढ़ी निजता, करियर, स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति को प्राथमिकता देती है। दोनों ही अपनी जगह सही हैं, पर जब एक दूसरे पर अपनी सोच थोपने लगते हैं, तो टकराव शुरू होता है।
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण है संवादहीनता। पहले दिन भर की बातें शाम को चौपाल या रसोई में साझा होती थीं। आज बातें व्हाट्सएप पर होती हैं और भावनाएं इमोजी में सिमट गई हैं। हम रोज़ एक-दूसरे को देखते हैं, पर सुनना बंद कर दिया है। इससे उपजती समस्याएं इस खाई का सबसे बड़ा दुष्परिणाम है एकाकीपन। घर में बुजुर्ग अकेले महसूस करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी सुनने वाला कोई नहीं। वहीं युवा तनाव में हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्हें समझने वाला कोई नहीं। संस्कारों का हस्तांतरण रुक गया है। दादा-दादी की कहानियों की जगह यूट्यूब ने ले ली है। घर में निर्णय अब चर्चा से नहीं, टकराव से होते हैं – चाहे विषय करियर का हो, विवाह का या जीवनशैली का।
समाधान: अंतराल पाटने के पाँच सूत्र इस समस्या का समाधान पीढ़ियों को एक जैसा बनाना नहीं, बल्कि उनमें सामंजस्य बिठाना है।
1. सुनना सीखें, सिखाना नहीं, बुजुर्गों को चाहिए कि वे ज्ञान को उपदेश की तरह नहीं, अनुभव की तरह साझा करें। युवाओं को चाहिए कि वे सुनें जरूर, पर आँख बंद करके नहीं, विवेक के साथ। परिवार में ‘मैं सही हूँ’ की जगह ‘हम मिलकर सही कैसे हो सकते हैं’ यह भाव आना चाहिए। 2. तकनीक को सेतु बनाएं क्यों न बेटा पिता को स्मार्टफोन चलाना सिखाए और पिता बेटे को जीवन में धैर्य रखना सिखाए? जब भूमिका बदलती है, तो सम्मान बढ़ता है। तकनीक दीवार नहीं, सेतु बननी चाहिए। 3. साझा समय का संकल्प रोज़ 30 मिनट का ‘नो मोबाइल जोन’ बनाएं। साथ बैठकर भोजन करना, त्योहार मनाना, या बिना किसी काम के सिर्फ बातें करना। भारतीय जैन मिलन जैसे संगठन जो पीढ़ियों को जोड़ने का काम कर रहे हैं, वे इसी साझा संस्कृति के सशक्त मंच हैं। 4. सम्मान के साथ स्वतंत्रता नई पीढ़ी को प्रयोग करने की छूट मिलनी चाहिए और पुरानी पीढ़ी को परंपरा के सम्मान की गारंटी। जड़ और शाखा का रिश्ता ऐसा ही है। जड़ पुरानी है, शाखा नई। शाखा को आकाश में फैलने की आज़ादी चाहिए, पर जड़ से कटकर वह सूख जाएगी। 5. भाषा बदलें, लहजा नहीं “तुझे ऐसा ही करना पड़ेगा” की जगह “तुम्हारा क्या विचार है?” यह एक वाक्य पूरे घर का वातावरण बदल सकता है। आदेश की जगह संवाद, अधिकार की जगह अपनत्व। दिगंबर जैन आचार्य विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य औजस्वी वक्ता, समाज सुधारक मुनि श्रमण सागर जी महाराज ने राघौगढ़ नगर में इस विकराल समस्या पर श्रमण धारा प्रवचन माला में प्रवचन करते हुए इस अंतराल पर सामंजस्य कैसे बिठाये कहा पीढ़ी अंतराल कोई अभिशाप नहीं, बल्कि प्रकृति का नियम है। हर पीढ़ी अपने समय से नई होती है। वीणा के तार अलग-अलग होते हैं, तभी संगीत बनता है। यदि सारे तार एक जैसे होते, तो संगीत नहीं, शोर होता। हमें तारों को एक जैसा नहीं करना, उन्हें एक लय में साधना है। यही सच्चा सामंजस्य है, यही भारतीय परिवार की आत्मा है।







