धर्म

साधना और जागृति के माध्यम से जीव अपने स्वरूप का अनुभव करता है,:- निर्यापक श्रमण मुनि समतासागर जी

कुण्डलपुर (विश्व परिवार)। “प्रत्येक जीव के भीतर अनंत शक्ति और परमात्मा बनने की योग्यता विद्यमान है। आवश्यकता केवल अपने उपादान को जागृत करने की है।” उक्त उद्गार निर्यापक श्रमण मुनिश्री समतासागर जी महाराज ने प्रातःकालीन धर्मसभा में शांतिधारा के वाचन से पूर्व व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आत्मकल्याण में देव, शास्त्र और गुरु महत्वपूर्ण निमित्त हैं, लेकिन वास्तविक परिवर्तन आत्मा के अपने परिणामों से होता है। साधना और जागृति के माध्यम से जब जीव अपने स्वरूप का अनुभव करने लगता है, तब यही संसारी आत्मा परमात्म पद की ओर अग्रसर होती है।
मुनिश्री ने निमित्त और उपादान का संबंध समझाते हुए कहा कि माटी के भीतर कुम्भ बनने की योग्यता पहले से मौजूद होती है। उस योग्यता को आकार देने में कुम्हार निमित्त बनता है। कुम्हार माटी के उपादान के बिना घड़ा नहीं बना सकता और माटी में घड़ा बनने की क्षमता होने के बावजूद वह स्वतः घड़े का रूप नहीं ले सकती। इसलिए दोनों के बीच समन्वय आवश्यक है। इसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में देव, शास्त्र और गुरु आत्मा के कल्याण में सहायक निमित्त बनते हैं, जबकि आत्मा का परिणमन उसके अपने भावों और पुरुषार्थ से होता है।
उन्होंने कहा कि भगवान की प्रतिमा, उनका जीवन, उनकी देशना और जिनवाणी आत्मजागरण के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। गुरु का सान्निध्य व्यक्ति को बाहरी दुनिया से दृष्टि हटाकर अपने भीतर देखने की प्रेरणा देता है। साधना के माध्यम से जब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप की अनुभूति करने लगती है, तब उसके भीतर परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है।
मुनिश्री ने दीपक का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारे भीतर प्रकाश देने की पूरी क्षमता मौजूद है। दीपक है, उसमें घी-तेल है और बत्ती भी लगी है, लेकिन वह तब तक प्रकाश नहीं देगा, जब तक उसे प्रज्वलित न किया जाए। इसी प्रकार आत्मा में अनंत शक्ति होते हुए भी वह संसार के अंधकार में भटकती रहती है। जागृत आत्माओं और गुरु के सान्निध्य से भीतर की चेतना को प्रज्वलित करने की प्रेरणा मिलती है।
उन्होंने कहा, “बड़े बाबा का इतना बड़ा उजाला है, दीपक आपका है, घी-तेल आपका है, बत्ती भी आपकी है, अब आवश्यकता केवल इतनी है कि अपने बुझे हुए दीपक को जले हुए दीपक के पास ले आएं।” कुण्डलपुर में भगवान के चरणों में पहुंचना केवल दर्शन या पूजा की क्रिया नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपे प्रकाश को पहचानने का अवसर है।
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि भगवान के अभिषेक और शांतिधारा को केवल बाहरी धार्मिक क्रिया न मानें। जब भगवान के चरणों में जल अर्पित करें, तब यह भावना भी रखें कि हमारे भीतर का अज्ञान और मोह दूर हो तथा आत्मचेतना का प्रकाश प्रकट हो। श्रद्धा, विनम्रता और समर्पण के साथ की गई आराधना आत्मचिंतन का माध्यम बनती है।
उन्होंने मंदिर की व्यवस्थाओं में सहयोग करने वाले प्रबंध समिति के सदस्यों, पुजारी बंधुओं, सेवाभावी कार्यकर्ताओं और अन्य सहयोगियों की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि श्रद्धालुओं को धर्मलाभ उपलब्ध कराने में इन सभी का योगदान महत्वपूर्ण है। व्यवस्था से लेकर पूजा-अर्चना तक प्रत्येक व्यक्ति अपनी भूमिका का निर्वहन करते हुए धर्मकार्य में सहभागी बनता है।
मुनिश्री ने कहा कि धर्माराधना से अशुभ कर्मों के क्षय और पुण्य के उदय की स्थिति बनती है। पुण्य के प्रभाव से जीवन में अनुकूल परिस्थितियां आती हैं, विघ्न-बाधाएं कम होती हैं और अनेक कार्य सहजता से संपन्न होते हैं। हालांकि इन सांसारिक उपलब्धियों को धर्म का अंतिम लक्ष्य नहीं मानना चाहिए। धर्म का उद्देश्य आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप की ओर ले जाना है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि भगवान के दर्शन, अभिषेक, शांतिधारा, पूजा-पाठ और जिनवाणी श्रवण को आत्मजागरण का साधन बनाएं। देव, शास्त्र और गुरु से मिलने वाले निमित्तों का सदुपयोग करते हुए अपने भीतर की चेतना को जागृत करें। आत्मा का वास्तविक उत्थान तभी होगा, जब बाहरी प्रेरणा के साथ भीतर से भी शुद्ध परिणाम और पुरुषार्थ जागृत हों।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने भगवान के चरणों में अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजा-अर्चना का लाभ लेते हुए आत्मजागरण और आध्यात्मिक साधना की भावना को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया।

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