- तीन दिवसीय संगोष्ठी में विद्वानों ने किया समयदेशना के आध्यात्मिक रहस्यों का गहन अनुशीलन,
- पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने की शोधपत्रों की सूक्ष्म समीक्षा
- मुनि बनो, मौनी बनो, मुनीम न बनो : पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज
दिल्ली (विश्व परिवार)। अध्यात्म, दर्शन और आगम-चिंतन की त्रिवेणी से ऋषभ विहार स्थित ऋषभोदय जैन तीर्थ तीन दिनों तक समयसारमय बना रहा। परम पूज्य पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य में 10 से 12 अक्टूबर 2026 तक ‘समयदेशना’ के सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार (भाग–13, 14 एवं 15) के अनुशीलन पर दिगम्बर जैन सभा, ऋषभ विहार, दिल्ली के आयोजकत्व में आयोजित राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी सफलतापूर्वक संपन्न हुई। डॉ. श्रेयांस कुमार जैन, बड़ौत के निर्देशन तथा डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर के संयोजकत्व में आयोजित इस संगोष्ठी का तत्वावधान एस. ए. विश्वविद्यालय, नवादा का रहा। संगोष्ठी में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए विद्वानों ने आचार्य कुंदकुंद स्वामी विरचित समयसार पर पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी की देशना कृति समयदेशना के आध्यात्मिक, दार्शनिक एवं तात्त्विक पक्षों पर गंभीर विमर्श किया।
छह सत्रों में हुआ गहन शास्त्रानुशीलन :
संगोष्ठी के छह सत्रों में विद्वानों ने अपने शोधपूर्ण आलेख प्रस्तुत किए। इनमें डॉ. श्रेयांस कुमार जैन, बड़ौत, प्रो. फूलचंद्र जैन प्रेमी, वाराणसी, प्रो. वीरसागर जैन, दिल्ली, प्रो. नलिन के. शास्त्री, दिल्ली, डॉ. नरेंद्र कुमार जैन, टीकमगढ़, प्रो. श्रेयांस कुमार सिंघई, जयपुर, पंडित विनोद कुमार जैन, रजवांस, प्रो. जयकुमार उपाध्ये, दिल्ली, प्रो. ऋषभ चंद्र फौजदार, दमोह, प्रो. विजय कुमार जैन, दिल्ली, डॉ. ब्र. अनिल जैन प्राचार्य, जयपुर, डॉ. ब्र. धर्मेंद्र जैन, जयपुर, प्रो. अनेकांत कुमार जैन, दिल्ली, डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर, डॉ. राकेश कुमार जैन, अंबाला, डॉ. पंकज जैन, इंदौर, सोनल कुमार जैन, दिल्ली, डॉ. अल्पना जैन, ग्वालियर, डॉ. ज्योति जैन, खतौली, डॉ. आशीष जैन शास्त्री, बम्होरी, डॉ. शिखरचंद्र जैन, दिल्ली, पंडित दिनेश जैन, भिलाई, ब्र. राकेश भैया, भिंड, डॉ. बाहुबली कुमार जैन, इंदौर, डॉ. राजेश शास्त्री, ललितपुर तथा पंडित मनीष संजयत, टीकमगढ़ प्रमुख रूप से सम्मिलित रहे।
प्रस्तुत शोधालेखों की परम पूज्य पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने अत्यंत गहराई से समीक्षा की। उनकी आगमसम्मत व्याख्या, सूक्ष्म तात्त्विक विवेचना और आध्यात्मिक दृष्टि ने संगोष्ठी को विशिष्ट ऊंचाई प्रदान की। विद्वानों के शोध और आचार्यश्री की देशना के समन्वय से समयसार के अनेक गूढ़ सिद्धांतों पर सार्थक विमर्श हुआ।
‘समयसार को अनुभूत करने के लिए निर्ग्रन्थ होना चाहिए’ :
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि समयपाहुड अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है और समयसार विश्व के अध्यात्म का सर्वोपरि ग्रंथ है। समयसार को केवल पढ़ना अथवा कंठस्थ कर लेना पर्याप्त नहीं, उसे अनुभूत करने के लिए साधक को निर्ग्रन्थ भाव की ओर अग्रसर होना चाहिए।
आचार्यश्री ने कहा कि ऐसी कोई विधा नहीं जो जैनदर्शन के अंदर न हो। ऐसी कोई विद्या नहीं जो जैनदर्शन के पास न हो। भारतभूमि पर जहां भी खोज की जाएगी, वहां अरिहंत परंपरा के चिह्न मिलेंगे। उन्होंने अपने गुरुवर गणाचार्य श्री विरागसागर जी महाराज का स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने निर्ग्रन्थ के साथ ग्रंथों की अमूल्य विरासत भी सौंपी।
गुरु के प्रति समर्पण की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा, “गुरु का चेहरा कम देखो, उनके चरण और आचरण देखो।” उन्होंने कहा कि वे संगोष्ठी में विद्वानों के मुख से प्रस्फुटित श्रुतज्ञान का आनंद ले रहे हैं। आज कुछ लोगों ने समयसार को कंठस्थ कर लेने को ही समयसार मान लिया है, जबकि उसका वास्तविक मर्म आत्मानुभूति में निहित है।
आचार्यश्री ने प्रेरक संदेश देते हुए कहा, “मुनि बनो, मौनी बनो, मुनीम न बनो।” उन्होंने जीवन में स्वाध्याय की निरंतरता पर बल देते हुए कहा कि ज्ञान-गोष्ठी तब तक पूर्ण नहीं होती, जब तक साधक स्वयं भगवान आत्मा के स्वरूप को प्राप्त करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ता।
शोधालेख निर्माण साधना के समान : मुनि श्री सुव्रतसागर जी :
मुनि श्री सुव्रतसागर जी महाराज ने कहा कि जिस प्रकार एक भव्य महल के निर्माण में वर्षों लग जाते हैं, उसी प्रकार किसी गंभीर शोधालेख के निर्माण में महीनों का अध्ययन, चिंतन और परिश्रम लगता है। ऐसी विद्वत् संगोष्ठियों में केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं होता, बल्कि ज्ञान की मीमांसा होती है और शास्त्रीय सिद्धांतों को समझने की नई दृष्टि प्राप्त होती है। उन्होंने विद्वत् परंपरा के संरक्षण तथा गंभीर स्वाध्याय को प्रोत्साहित करने में ऐसी संगोष्ठियों की महत्वपूर्ण भूमिका रेखांकित की।
अनेक महत्वपूर्ण कृतियों का हुआ विमोचन :
संगोष्ठी के अवसर पर अनेक महत्वपूर्ण कृतियों का विमोचन किया गया। इनमें परम अध्यात्म देशना, वस्तुत्व व्याख्यान, विचार, जैन सिद्धांत (अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन शास्त्रि-परिषद की शोध पत्रिका), श्रेयो भारती भाग–2 तथा जिन सहस्रनाम स्तोत्र प्रमुख हैं। विद्वानों एवं अतिथियों ने इन कृतियों का विमोचन किया। संगोष्ठी के दौरान सुप्रसिद्ध गीत और संगीतकार रूपेश जैन के नए गीत ‘हे! विराग के चिराग’ को यूट्यूब पर लांच किया गया जिसका विमोचन हुआ।
विद्वानों का भव्य बहुमान एवं सम्मान :
दिगम्बर जैन सभा, ऋषभ विहार, दिल्ली की ओर से संगोष्ठी में सम्मिलित विद्वानों का भव्य बहुमान किया गया। सभा के अध्यक्ष सुनील जैन, मनोज जैन, विजेंद्र जैन सहित अन्य पदाधिकारियों ने विद्वानों को प्रशस्ति-पत्र, प्रमाण-पत्र, साहित्य, माला, स्मृतिचिह्न एवं अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया। आयोजन में विद्वानों के प्रति सम्मान, शास्त्र-साधना के प्रति निष्ठा और ज्ञान-परंपरा के संरक्षण की भावना विशेष रूप से दिखाई दी।
संगोष्ठी में श्री शास्त्री संस्कृत विश्वविद्यालय के जैनदर्शन विभाग के अनेक शोधार्थी एवं विद्यार्थी भी प्रतिभागी के रूप में सम्मिलित हुए।
‘समयदेशना’ में समाहित है गहन आध्यात्मिक चिंतन :
संगोष्ठी के निर्देशक डॉ. श्रेयांस कुमार जैन, बड़ौत ने कहा कि आचार्य कुंदकुंद विरचित समयसार पर वर्तमान के अध्यात्मवेत्ता पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने अध्यात्मरसिक एवं स्वाध्यायी जनों के उपकारार्थ जो देशना प्रदान की है, वह ‘समयदेशना’ के सत्रह भागों में प्रकाशित है।
उन्होंने कहा कि आचार्यश्री गंभीर चिंतक हैं और उनका देशना-साहित्य किसी काल अथवा जाति विशेष तक सीमित नहीं है। उसमें निहित आध्यात्मिक दृष्टि आत्मकल्याण, तत्त्वचिंतन और शाश्वत सत्य की अनुभूति के लिए व्यापक प्रेरणा प्रदान करती है।
आठ वर्षीय मास्टर मोहांश जैन ने कंठस्थ शास्त्रज्ञान से किया चमत्कृत :
संगोष्ठी में गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज आठ वर्षीय बाल प्रतिभा मास्टर मोहांश जैन, पुत्र अभिषेक जैन, दिल्ली ने जैनदर्शन के कंठस्थ श्लोकों एवं गाथाओं का प्रभावशाली प्रस्तुतिकरण किया। इतनी अल्पायु में उसकी अद्भुत स्मरणशक्ति और शास्त्रज्ञान देखकर उपस्थित विद्वान एवं जनसमुदाय अचंभित रह गए। सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा और सभी ने मुक्तकंठ से उसकी सराहना की। उल्लेखनीय है कि मोहांश को रत्नकरण्डक श्रावकाचार, तत्त्वार्थसूत्र, द्रव्यसंग्रह, इष्टोपदेश, भक्तामर स्तोत्र तथा छहढाला संपूर्ण कंठस्थ हैं। उसकी यह विलक्षण प्रतिभा जैन धर्म, दर्शन एवं शास्त्रीय परंपरा के उज्ज्वल भविष्य का प्रेरणादायी संकेत है।
आगम, न्याय और अध्यात्म का अद्भुत समन्वय :
संगोष्ठी में पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज की देशना ने आचार्य कुंदकुंद के आध्यात्मिक चिंतन, आचार्य समंतभद्र की ओजस्वी शैली तथा न्यायशास्त्र की तार्किक दृष्टि का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया। आगमसम्मत तर्कों और गहन तात्त्विक विवेचन से आचार्यश्री ने समयसार के मर्म को सजीव किया। विद्वानों के शोधपूर्ण विमर्श ने स्पष्ट किया कि समयसार का वास्तविक प्रयोजन केवल शास्त्रीय ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप की पहचान, सम्यक् दृष्टि और आध्यात्मिक अनुभूति है। संगोष्ठी में उपस्थित सैकड़ों श्रद्धालुओं के साथ ऑनलाइन माध्यम से हजारों लोगों ने भी इस ज्ञानामृत का लाभ लिया। इस प्रकार तीन दिवसीय आयोजन ने जैन आगम, अध्यात्म एवं तत्त्वचिंतन की परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान की।







