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एम्स रायपुर में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस पर राज्य स्तरीय कार्यशाला एवं सतत चिकित्सा शिक्षा (CME) का आयोजन

रायपुर (विश्व परिवार)। एम्स रायपुर के माइक्रोबायोलॉजी विभाग द्वारा 16 एवं 17 जुलाई 2026 को एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) विषय पर दो दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला एवं सतत चिकित्सा शिक्षा (CME) कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विश्वभर में तेजी से उभर रही एंटीबायोटिक प्रतिरोध (AMR) की चुनौती से निपटने के लिए जागरूकता बढ़ाना तथा स्वास्थ्यकर्मियों की क्षमता विकसित करना था। इसमें छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों से माइक्रोबायोलॉजिस्ट, चिकित्सक, प्रयोगशाला तकनीशियन तथा अन्य स्वास्थ्य पेशेवरों ने भाग लिया।
कार्यक्रम के पहले दिन 16 जुलाई को राज्य के सरकारी एवं निजी स्वास्थ्य संस्थानों से नामांकित लगभग 40 प्रयोगशाला तकनीशियनों के लिए एक हैंड्स-ऑन कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें माइक्रोबायोलॉजी विभाग के रेजिडेंट डॉक्टरों एवं तकनीकी कर्मचारियों द्वारा प्रतिभागियों को बैक्टीरियोलॉजी तकनीकों तथा एंटीमाइक्रोबियल ससेप्टिबिलिटी टेस्टिंग (Antimicrobial Susceptibility Testing) का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया, ताकि प्रदेश में डायग्नोस्टिक माइक्रोबायोलॉजी सेवाओं को और सुदृढ़ बनाया जा सके। 17 जुलाई को आयोजित CME में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के बढ़ते खतरे, भारत में AMR की वर्तमान स्थिति, आधुनिक डायग्नोस्टिक तकनीकों, नई उपचार पद्धतियों तथा एंटीमाइक्रोबियल स्टूअर्डशिप में माइक्रोबायोलॉजी प्रयोगशालाओं की महत्वपूर्ण भूमिका पर विशेषज्ञ व्याख्यान आयोजित किए गए। नई दिल्ली एवं हैदराबाद से आए प्रतिष्ठित विशेषज्ञों ने संक्रामक रोगों एवं एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस से जुड़ी नवीनतम चुनौतियों और उनके समाधान पर अपने अनुभव साझा किए।
कार्यक्रम का उद्घाटन एम्स रायपुर के कार्यपालक निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त) ने मुख्य अतिथि के रूप में किया, जबकि सीआईएमएस, बिलासपुर के डीन एवं माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. रमनेश मूर्ति विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
अपने उद्घाटन संबोधन में लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त) ने कहा कि एंटीबायोटिक दवाओं का अनावश्यक उपयोग तथा स्वयं दवा लेना (Self-medication) एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के प्रमुख कारण हैं। उन्होंने कहा कि लगभग एक शताब्दी पहले सर अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने भी चेतावनी दी थी कि यदि पेनिसिलिन और अन्य एंटीबायोटिक दवाओं का विवेकपूर्ण उपयोग नहीं किया गया, तो भविष्य में दवाओं के प्रति प्रतिरोधी जीवाणु विकसित हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि आज यह चेतावनी पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। उन्होंने एंटीबायोटिक दवाओं के जिम्मेदार उपयोग, मजबूत माइक्रोबायोलॉजी प्रयोगशालाओं तथा प्रभावी एंटीमाइक्रोबियल स्टूअर्डशिप को समय की आवश्यकता बताया। साथ ही उन्होंने समुदाय स्तर पर भी सशक्त हस्तक्षेप करने की आवश्यकता पर बल दिया।
CME में राज्यभर के माइक्रोबायोलॉजिस्टों के साथ-साथ एम्स रायपुर के विभिन्न विभागों के चिकित्सकों एवं एंटीबायोटिक लिखने वाले विशेषज्ञों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। वैज्ञानिक कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण मेडिकल, पीडियाट्रिक एवं कार्डियक इंटेंसिव केयर यूनिट (MICU, PICU एवं CCU) के रेजिडेंट डॉक्टरों द्वारा जटिल क्लिनिकल मामलों की प्रस्तुति रही, जिस पर बहु-विषयक विशेषज्ञों के बीच सार्थक चर्चा हुई और एंटीमाइक्रोबियल उपचार के बेहतर विकल्पों पर विचार-विमर्श किया गया।
यह कार्यक्रम छत्तीसगढ़ एसोसिएशन ऑफ मेडिकल माइक्रोबायोलॉजिस्ट्स (CAMM) के तत्वावधान में आयोजित किया गया। आयोजन का नेतृत्व प्रो. अनुदिता भार्गव ने आयोजन अध्यक्ष के रूप में किया। डॉ. प्रज्ञा अग्रवाला CME की आयोजन सचिव एवं कार्यशाला समन्वयक तथा डॉ. अभिजीत प्रसाद संयुक्त आयोजन सचिव एवं कार्यशाला समन्वयक रहे। कार्यक्रम के सफल आयोजन में विभाग के संकाय सदस्यों, रेजिडेंट डॉक्टरों, तकनीकी एवं सहायक कर्मचारियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
इस दो दिवसीय कार्यक्रम में 100 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जो प्रदेश में बेहतर डायग्नोस्टिक सेवाओं, एंटीबायोटिक दवाओं के विवेकपूर्ण उपयोग तथा एंटीमाइक्रोबियल स्टूअर्डशिप को मजबूत बनाने के प्रति स्वास्थ्य पेशेवरों की बढ़ती प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने कहा कि प्रयोगशाला कर्मियों का नियमित प्रशिक्षण, चिकित्सकों की सतत चिकित्सा शिक्षा तथा माइक्रोबायोलॉजिस्ट और उपचार करने वाले चिकित्सकों के बीच घनिष्ठ समन्वय ही एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस जैसी गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती से प्रभावी ढंग से निपटने तथा मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

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